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भूतिया खिलौने की दुकान – भाग 3:

भाग 1: गुड़िया वापस आ गई! माया, रोहन और आदित्य घबराकर वहीं रुक गए। गुड़िया को तो उन्होंने मिट्टी में दबा दिया था, फिर यह यहाँ कैसे आई? "यह... यह असंभव है!" माया फुसफुसाई। आदित्य ने धीरे-धीरे गुड़िया की ओर कदम बढ़ाए। जैसे ही उसने उसे छूने की कोशिश की, गुड़िया हवा में उठ गई और उसकी आँखें चमकने लगीं। "तुमने सोचा कि तुम मुझे हरा सकते हो?" गुड़िया की आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की तरह गूँजी। भाग 2: एक और सुराग रोहन ने तेजी से डायरी निकाली और पन्ने पलटने लगा। तभी उसे एक पेज मिला जो पहले नहीं दिखा था—"गुड़िया तब तक ज़िंदा रहेगी, जब तक इसे बनाने वाले का आत्मा मुक्त नहीं होता।" "शर्मा जी की आत्मा अब भी बंधी हुई है," रोहन ने कहा। "तो हमें उसकी आत्मा को मुक्त करना होगा," माया बोली। भाग 3: शर्मा जी का सच तीनों फिर से जली हुई दुकान के पास गए और वहां खुदाई शुरू की। कुछ ही देर में उन्हें ज़मीन के नीचे एक पुराना, जला हुआ लकड़ी का बॉक्स मिला। "हो सकता है इसमें कुछ जरूरी हो," आदित्य ने कहा। उन्होंने बॉक्स खोला। अंदर एक पुरानी चाभी और एक तस्वीर थी। तस...

शापित शहर – एपिसोड 12: एक नई भूलभुलैया

  पिछले एपिसोड में: अर्णव ने खुद को बलिदान कर दिया ताकि खेल खत्म हो सके। विराट को लगा कि वह खेल से बाहर आ चुका है , लेकिन जैसे ही उसने राहत की साँस ली, हवा में एक रहस्यमयी आवाज़ गूँजी— "क्या तुमने सच में सोचा कि यह खत्म हो गया?" अब सवाल यह था— क्या विराट सच में बच गया है, या यह सिर्फ़ एक नया स्तर है? अध्याय 1: नया संसार विराट ने धीरे-धीरे चारों ओर देखा। सब कुछ सामान्य लग रहा था— कोई शापित शहर नहीं, कोई परछाईं नहीं, कोई खेल नहीं। वह एक खाली सड़क पर खड़ा था। पास में एक घड़ी की दुकान थी, जिसमें समय 3:33 AM दिखा रहा था। लेकिन तभी... सड़क पर एक आदमी चला आ रहा था—अर्णव! विराट की आँखें फटी रह गईं। "नहीं... यह संभव नहीं है।" अर्णव तो मर चुका था। "तुम... तुम जिंदा कैसे हो?" विराट ने फुसफुसाया। अर्णव मुस्कुराया। "मैं कभी मरा ही नहीं था।" अध्याय 2: सच्चाई का एक और पर्दा विराट ने अर्णव की ओर देखा। "क्या तुम असली हो?" "क्या तुम असली हो?" अर्णव ने वही सवाल दोहरा दिया। विराट का दिमाग सुन्न हो गया। अगर खेल खत्म हो चुका ...

सच्ची मेहनत का फल

 बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में रामु नाम का एक लड़का रहता था। रामु बहुत मेहनती और ईमानदार था, लेकिन उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। उसके माता-पिता खेती करके मुश्किल से घर चलाते थे। रामु पढ़ाई में बहुत अच्छा था, लेकिन पैसे की कमी के कारण वह ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाता था। ज्ञान की ओर पहला कदम रामु का सपना था कि वह बड़ा होकर एक विद्वान बने और अपने गाँव का नाम रोशन करे। लेकिन किताबें खरीदने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। गाँव में एक सेठ था, जिसके पास बहुत सारी किताबें थीं। रामु ने सोचा कि अगर वह सेठ के यहाँ कोई काम करे तो शायद उसे किताबें पढ़ने का मौका मिल जाए। रामु सेठ के पास गया और विनम्रता से बोला, "सेठ जी, मैं आपके यहाँ कोई भी काम करने को तैयार हूँ। बस बदले में मुझे आपकी लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पढ़ने दें।" सेठ उसकी लगन देखकर प्रभावित हुआ और उसे रोज़ शाम को दुकान की सफाई करने का काम दे दिया। बदले में रामु को लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ने की अनुमति मिल गई। मेहनत और लगन का जादू रामु हर दिन स्कूल से आकर सेठ की दुकान पर सफाई करता और फिर घंटों किताबें पढ़ता। ...